Kaliyug ka Mahabharat

 बैठे थे नारायण ध्यान में

अतुलित तेज और मुस्कान लिए, चित में महादेव का दिव्य राग था और बैठे सुकोमल होठ सिये। शंकर का ध्यान धरे बैठे और मनुज की चिंता मन में समाई थी, जिस मनुज को पाल पोस कर बड़ा किया शायद उसके विनाश की घड़ी आई थी। वातावरण में अशांति सहसा हुई कुछ अंधकार सा छाया था, अपना दरिद्र और धूर्त मुखमंडल लिए कलि पुरुष विष्णु लोक चला आया था। मंद मंद मुस्काए नारायण ये सोचकर मति भ्रष्ट हुई है इसकी या अक्ल पर पर्दा इसकी आया है, समस्त ब्रम्हांड को त्यागकर ये मूर्ख अपने काल से मिलने आया है। समय और नियति की ठिठोली देखो कैसा हास्यास्पद क्षण आया है, त्रिकालदर्शी नारायण को अपना परिचय देने कलि पुरुष चलकर आया है। अहंकार में भरकर बोला कलि अरे विष्णु तू जो अपने सामर्थ्य पर इतराता है, मैं जान चुका हूं भेद तेरा मनुज रूपी अपने बच्चों को तू पीड़ा देने से कतराता है। मैं रावण, कंस, दूर्योधन सा मूर्ख नही जो तुझसे सीधे ही टकराऊंगा, मैं तो मनुज को भ्रम में डालकर आपस में लड़वाऊंगा। बसता हूं मैं ज़ेहन में मनुज के आज सोच पर सबकी सवार हूं, धर्म को मैंने ठहरा दिया गलत है इंसानियत खत्म करने को मैं तैयार हूं। तूने मनुज के लिए रावण वध किया कृत्य तेरा मनभावन है, पर जिनका तूने उद्धार किया वो खुद बन बैठे आज रावण है। कुछ ही होंगे जो मेरी माया समझेंगे और धर्म के पक्ष में जाएंगे, वरना घर घर में अब रावण होंगे जो पापी और छलिया तुझे ही बताएंगे। तू क्या सोचता है द्रौपदी को सम्मान दिलाकर तूने कार्य बड़ा ही महान किया, मैंने फिर से मनुज को दुर्योधन बनाकर ना जाने कितनी द्रोपदी का अपमान किया। अरे तेरा अर्जुन भी आज अपशब्द है सुनता तेरी मूर्ति केवल एक पर्ण है, घर घर में आज दुर्योधन का हितैषी बैठा है समझता खुद को कर्ण है। तूने चाहे युगों युगों से युद्ध लड़े हों तू मुझसे जीत ना पाएगा, अरे मुझसे पहले क्या इन रावण दुर्योधन के भक्तों से भिड़ पाएगा। तूने बनाई थी ऋतुएं धर्ममयी मैंने रचा अधर्म का अब ये सावन हैं, पहले तो तूने हर युग में एक हराया आज असंख्य खड़े दुर्योधन और रावण हैं। तेरा लक्ष्मण अब तेरे साथ नही है कैसे बच तू पाएगा, हर रावण से पहले आकर तुझसे एक मेघनाद टकराएगा। आज किसके रथ की धुरा तू थामेगा ना ही अर्जुन होगा, ना ही पांडव तुझ संग आयेंगे, कैसे बिना पार्थ तू शीश गिराएगा उनका जब समक्ष तेरे हजारों कर्ण खड़े मुस्काएंगे। तुझे पापी और छलिया घोषित करके अधर्मी समाज नया अब बस जाएगा, काल के पहले अस्तित्व में था जो वही अंधकार फिर से छाएगा। नारायण के स्थिर मुखमंडल के भाव फिर डोल उठे, मंद मंद मुस्काए नारायण तदनांतर कलि से बोल उठे कंस नही था मैंने मारा जब उसने कत्ल नवजात किए, रावण नही था मैने मारा जब उसने जघन्य अपराध किए। जब अधर्मी पाप करता चले तो उसे पाप ही रास आता है, नियति का चक्र चलता है और पाप का घड़ा सहसा ही भर जाता है। वैसे ही ये फिर से ये चक्र चलेगा पाप तू भी करता जाएगा, जैसे कंस और रावण का भरा था पाप का घड़ा तेरा भी भर जायेगा। दुर्योधन कर्ण जो बने खड़े है उनको तो मैं हाथ भी ना लगाऊंगा, मेरे बच्चे आज भी जो मेरे साथ हैं किसी एक को फिर से मैं गांडीवधारी बनाऊंगा। हां जानता हूं मैं तेरे भ्रमित किए अधर्मी सारे जग में व्याप्त हैं, पर आज भी केवल कुछ धर्मयोद्धा उन सभी के लिए पर्याप्त हैं। आज भी मेरे लक्ष्मण और अर्जुन सभी अधर्मियों पर भारी है, रामायण पढ़ने वालों में मेरा लक्ष्मण अभी भी है और गीता समझने वालों में आज भी गांडीवधारी है। जिन मस्तकों में भी तेरा वास हुआ है हर मस्तक वो कट जायेगा, फिर से महाबली कर्ण धराशाई होगा दुर्योधन टूटी जंघा पकड़कर रोएगा कर्राहेगा। अधर्म संग जो भी खड़े रहेंगे सब के सब पिस जाएंगे, ना दान कोई काम आएगा सभी शूल शय्या पर बिछ जाएंगे। टूटी जंघाओं में उनकी भी कीड़े पड़ेंगे और लाश को गिद्ध नोच नोचकर खाएंगे। अधर्म के जो पुजारी आज बने हैं मेरा रौद्ररुप देख घबराएंगे। जिसने भी कलियुग में स्त्री का मान भंग किया है उसका फिर से वंश गारत होगा, द्वापर से भी कही अधिक प्रचंड कलियुग का महाभारत होगा। अरे द्वापर से भी कही अधिक प्रचंड कलयुग का महाभारत होगा। ये तो अंत सिर्फ उनका है जिनके मन में अधर्म की बात चली, तेरी तो और भी दुर्दशा होगी क्योंकि तू ही तो है अधर्म का बीज कलि। पहले भी कितने सेना लेकर आए तू भी एक बना ले जा, रावण दुर्योधन के संग सहस्त्रों कर्ण और मेघनाद ले आ। धर्म की पताका जो थामेगा यश केवल वोही पाएगा, अरे जैसा युगों युगों से अधर्म के साथ हुआ है वैसे ही तू भी मारा जायेगा। अरे जैसा युगों युगों से अधर्म के साथ हुआ है वैसे ही तू भी मारा जायेगा।

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