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Showing posts from July, 2022

रणभूमि में छल करते हो तुम कैसे भगवान हुये

  सारा जीवन श्रापित श्रापित हर रिशता बेनाम कहो मुझको ही छलने के खातिर मुरली वाले श्याम कहो तो किसे लिखु मै प्रेम की पाती किसे लिखु मै प्रेम की पाती कैसे कैसे इंसान हुये कि किसे लिखु मै प्रेम की पाती कैसे कैसे इंसान हुये अरे रणभूमि में छल करते हो तुम कैसे भगवान हुये रणभूमि में छल करते हो तुम कैसे भगवान हुये   कि मन कहता है मन करता है,कुछ तो माँ के नाम लिखु कि मन कहता है मन करता है,कुछ तो माँ के नाम लिखु और एक मेरी जननी को लिख दु, एक धरती के नाम लिखु प्रश्न बड़ा है मौन खड़ा धरती संताप नही देती कि प्रश्न बड़ा है मौन खड़ा धरती संताप नही देती और धरती मेरी माँ होती तो,मुझको श्राप नही देती तो जननी माँ ने वचन लिया, जननी माँ ने वचन लिया अर्जुन का काल नही हुँ मै कि जननी माँ ने वचन लिया अर्जुन का काल नही हुँ मै अरे जो बेटा गंगा मे छोड़े,उस कुंती का लाल नही हुँ मैं जो बेटा गंगा मे छोड़े,उस कुंती का लाल नही हुँ मैं तो क्या लिखना इन्हे प्रेम की पाती क्या लिखना इन्हे प्रेम की पाती,जो मेरी ना पहचान हुये अरे रणभूमि में छल करते हो तुम कैसे भगवान हुये कि सारे जग का तम हरते बेट...

A Poem about Invincible Warrior Arjun

  गाथा सुनाता हूं उस वीर की शत्रु जिसके बाणों से कराहते थे, केवल कृष्ण की ना बात करो स्वयं शिव उसे सराहते थे। करूणा से भरा हृदय था जिसका न तनिक भी मन में स्वार्थ था, तीनो लोक में प्रशंसा पाने वाला मेरे माधव का वो पार्थ था रावण इंद्र थे पराजित जिनसे 3 करोड़ निवात कवचों पर अकेला ही वो भारी था, अरे शिव को अपने धनुष से खींचने वाला वो मेरा गांडीवधारी था। योद्धा तो थे श्रेष्ठ बहुत पर मैं क्यों अर्जुन अर्जुन गाता हूं, महाभारत के उस महासमर से चौदहवें दिन का वृतांत सुनाता हूं। अभिमन्यु की निर्मम हत्या से अर्जुन की भीषण हुंकार हुई, सूर्यास्त कल का नहीं देखेगा जयद्रथ गांडीव की भयंकर टंकार हुई। अर्जुन की प्रतिज्ञा से धरती उस दिन कांप गई, रणभूमि में होने वाले तांडव को कुरु सेना थी भांप गई। रूद्र तांडव जैसा उस दिन युद्ध बड़ा ही क्रूर था, श्रेष्ठ योद्धा होने का उस दिन कईयों का वहम भी दूर था। कौरव योद्धा लगे विचारने कैसा भयंकर क्षण होगा, जब अर्जुन उतरेगा रणभूमि में जीवन नहीं मरण होगा। अब सुनो कैसा भीषण रक्तपात हुआ अगले दिन जब शंखनाद हुआ, कुरुओं के भाग्य थे फूट पड़े अर्जुन और सात्यकी उन पर...

Kaliyug ka Mahabharat

  बैठे थे नारायण ध्यान में अतुलित तेज और मुस्कान लिए, चित में महादेव का दिव्य राग था और बैठे सुकोमल होठ सिये। शंकर का ध्यान धरे बैठे और मनुज की चिंता मन में समाई थी, जिस मनुज को पाल पोस कर बड़ा किया शायद उसके विनाश की घड़ी आई थी। वातावरण में अशांति सहसा हुई कुछ अंधकार सा छाया था, अपना दरिद्र और धूर्त मुखमंडल लिए कलि पुरुष विष्णु लोक चला आया था। मंद मंद मुस्काए नारायण ये सोचकर मति भ्रष्ट हुई है इसकी या अक्ल पर पर्दा इसकी आया है, समस्त ब्रम्हांड को त्यागकर ये मूर्ख अपने काल से मिलने आया है। समय और नियति की ठिठोली देखो कैसा हास्यास्पद क्षण आया है, त्रिकालदर्शी नारायण को अपना परिचय देने कलि पुरुष चलकर आया है। अहंकार में भरकर बोला कलि अरे विष्णु तू जो अपने सामर्थ्य पर इतराता है, मैं जान चुका हूं भेद तेरा मनुज रूपी अपने बच्चों को तू पीड़ा देने से कतराता है। मैं रावण, कंस, दूर्योधन सा मूर्ख नही जो तुझसे सीधे ही टकराऊंगा, मैं तो मनुज को भ्रम में डालकर आपस में लड़वाऊंगा। बसता हूं मैं ज़ेहन में मनुज के आज सोच पर सबकी सवार हूं, धर्म को मैंने ठहरा दिया गलत है इंसानियत खत्म करने को मैं ...