मेरा प्यारा गाँव






कार बनाने वाले चलकर पाँव से आए थे
शहर बसाने वाले भी चलकर गाँव से आए थे

शहर घूमता है काले चश्मे लगाकर
गाँव अब भी नजर मिला लेता है !!

शहर बीमार होता है दवाओ से
गाँव बीमारी में भी खुद को जिला लेता है !!

शहर से घर को लोग खाली हाथ लौट जाते है
गाँव में लोग बर्तन भी खाली नहीं लौटाते है !!

नकली चेहरे गाँव में भी है मगर उनकी आँखे सच्ची है,
शहर कि भीतरी शोर से आटा चक्की कि पुक पुक अच्छी है !!

गाँव में देखो मुस्कुराती है फूल कलियाँ 

शहर ने पहले बाल रंगे फिर हरी सब्जियाँ !!

पर देखा है मैंने थोडा सा शहर घुस रहा है गाँव में
कोई कर रहा है चुपके से छेद नाव में, !!

ए सी कि कमी गिना रहा है पीपल कि छाँव में,
पहिया पलायन का बाँध लिया है उसने पाँव में !!

फोन का नेटवर्क पूरा आने लगा है मेरे गांव में …
पर अफसोस चिड़ियों की चहचहाहट अब सुनाई नहीं देती!!

ये कल का गाँव आज शहर हो गया,
जो था कल तक मीठा आज ‘जहर’ हो गया!!

एक गाँव ही तो है जो छोड़ जाने के बाद भी पनाह देता है
देता है रोटी, छाव, बहुत सा अपनापन उसको भी जो
शहर जाने का कर गुनाह देता है!!

आज गाँव को शहर नहीं
शहर को गाँव बनने की जरूरत है!!

मेरी दुआ है खूब तरक्की करे यह ज़माना
मगर गाँव कि लाश पर शहर मत उगाना !!

शहर बसा के अब गाँव ढूंढ़ते हैं

अजीब पागल लोग हैं ये

हाथ में कुल्हाड़ी लेकर छाँव ढूंढ़ते है !!






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